
“आज के समय में, जब समाज तेज़ी से बदलाव देख रहा है, हमें यह सोचने की ज़रूरत है कि क्या हम अपने बच्चों को एक ऐसे देश का भविष्य दे रहे हैं जहाँ वे अपने अधिकार और कर्तव्य समझते हों?इसी सवाल ने एक युवा डॉक्टर डॉ. अभिषेक पंकज को एक अनोखी राह पर चलने की प्रेरणा दी। अपनी कजिन बहन की शादी में, जहाँ आमतौर पर लोग सिर्फ खुशियों में खो जाते हैं, उन्होंने पूरे समाज को जागरूक करने के लिए एक छोटी-सी लेकिन बेहद गहरी पहल की—टीम संविधान जागृति मंच हर घर में संविधान की एक प्रति पहुँचाने का संकल्प।उन्होंने विवाह समारोह में अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ संविधान पुस्तक लेकर फोटो खिंचवाने का निर्णय लिया।लेकिन यह सिर्फ एक फोटो नहीं थी—यह एक संदेश था।एक आवाज़ थी।एक पुकार थी—“यदि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को सुरक्षित, सम्मानजनक और न्यायपूर्ण समाज देना चाहते हैं…तो सबसे पहले हमें संविधान पढ़ना होगा, समझना होगा और उसे जीना होगा।”डॉ. अभिषेक कहते हैं—“हम त्यौहारों में दीपक जलाते हैं, पर क्या कभी अपने अधिकारों की रोशनी जलाने के बारे में सोचा?”जब आम आदमी अपना संविधान जान लेता है—तो वह डरता नहीं…वह टूटता नहीं…वह किसी के आगे झुकता नहीं…क्योंकि उसे पता है कि उसके अधिकार क्या हैं, उसके कर्तव्य क्या हैं, और उसका देश किस नींव पर खड़ा है।इस पहल का सबसे बड़ा संदेश यही है—“एक शादी सिर्फ दो परिवारों का मिलन नहीं…एक समाज को जोड़ने का अवसर भी हो सकती है।”आज जिस देश में लोग मोबाइल के कवर तक सोच-समझकर चुनते हैं,वही लोग अपने देश की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक—संविधान—खोलकर नहीं देखते।यहीं बदलाव लाना है।डॉ. अभिषेक पंकज ने जिस साहस और संकल्प से यह कदम उठाया है,वह बताता है कि परिवर्तन हमेशा बड़े मंचों से नहीं…कभी-कभी एक परिवार की फोटो से भी शुरू होता है।“जब हर घर में संविधान होगा, तभी हर दिल में समानता, न्याय और भाईचारे की भावना जगेगी।”यह पहल सिर्फ एक घटना नहीं,एक आंदोलन की शुरुआत है—एक ऐसा आंदोलन जो किताब से नहीं…दिलों से जुड़ेगा।
